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कार्बन उत्सर्जन को प्रदूषण मानने की गुहार

११ सितम्बर २०२३

नौ द्वीपीय देशों ने संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय समुद्री अदालत से गुहार लगाई है कि वह उन देशों को विनाशकारी जलवायु परिवर्तन से बचाए. हैंबर्ग की अदालत में इस मामले पर सुनवाई हो रही है.

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वनुआतु का इरेकोर आइलैंड
बढ़ता समुद्री जलस्तर कई देशों के लिए अस्तित्व का संकट बन रहा हैतस्वीर: mvaligursky /imago images

"इंटरनेशनल ट्राइब्यूनल फॉर द लॉ ऑफ द सी" में इन द्वीपीय देशों ने अपील की है कि महासागरों में अवशोषित होने वाले कार्बन डाइऑक्साइ़ड उत्सर्जन को प्रदूषण माना जाए. उनका कहना है कि अगर ऐसा होता है, तो दुनिया के देशों को इस प्रदूषण को रोकना होगा.

जिस ऑक्सीजन में इंसान सांस लेता है, उसका आधा हिस्सा महासागरीय ईकोसिस्टम बनाते हैं. इसके अलावा मानवीय गतिविधियों से पैदा होने वाले कार्बन डाइ ऑक्साइड का एक बड़ा हिस्सा सोख लेते हैं. लगातार बढ़ता उत्सर्जन एक तरफ जहां समुद्र को गरम और अम्लीय बनाएगा, वहीं समुद्री जीवन को भी नुकसान पहुंचाएगा.

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उत्सर्जन को प्रदूषक मानने की अपील

इन देशों ने संयुक्त राष्ट्र की संधि यूएनसीएलओएस की तरफ ध्यान दिलाया है, जो इसमें शामिल देशों के लिए समुद्री प्रदूषण को रोकना बाध्यकारी बनाता है. संयुक्त राष्ट्र की इस संधि के मुताबिक प्रदूषण "वह चीज या उर्जा है, जो समुद्री वातावरण" में इंसानों के जरिए आता है और समुद्री जीवन को प्रभावित करता है. हालांकि यह कार्बन उत्सर्जन को प्रदूषक के रूप में नहीं देखता. ये देश चाहते हैं कि यह उत्सर्जन प्रदूषक माना जाना चाहिए.

द्वीपीय देशों ने लगाई अंतरराष्ट्रीय अदालत से गुहार
बढ़ते समुद्री जलस्तर से इन देशों के डूबने का खतरा हैतस्वीर: Mario Tama/Getty Images

अपील करने वाले देशों में तुवालु भी शामिल है. तुवालु के प्रधानमंत्री काउसी नातानो का कहना है, "सारे समुद्री और तटवर्ती ईकोसिस्टम पानी में खत्म हो रहे हैं क्योंकि यह गरम और अम्लीय हो रहा है. विज्ञान अविवादित और स्पष्ट हैः ये असर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की वजह से हो रहे जलवायु परिवर्तनका है."

नातानों का कहना है कि हम यहां मदद मांगने आए हैं.

छोटे द्वीपों पर दिख रहा गंभीर असर

जलवायु न्याय की कोशिशों को मार्च में बड़ी सफलता मिली, जब संयुक्त राष्ट्र आमसभा ने इससे जुड़ा एक प्रस्ताव पास कर दिया. इसमें अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत से उन देशों के लिए पृथ्वी के जलवायु की रक्षा को बाध्यकारी बनाने और ऐसा नहीं करने पर कानूनी नतीजे भुगतने के लिए नियम बनाने की बात कही गई है. संयुक्त राष्ट्र में इस कदम का नेतृत्व वनुआतु ने किया था, जो 11 सितंबर को जर्मनी के हैंबर्ग में हो रही सुनवाई में भी शामिल है.

द्वीपीय देशों ने लगाई अंतरराष्ट्रीय समुद्री अदालत से गुहार
बदलती जलवायु का समुद्री जीवन भी खूब असर हो रहा हैतस्वीर: David Goldman/AP/picture alliance

वनुआतु जैसे छोटे द्वीप खासतौर से ग्लोबल वार्मिंग के असर को सबसे ज्यादा महसूस कर रहे हैं. समुद्री जलस्तर बढ़ रहा है और यह पूरे देश को ही डुबो सकता है.

कार्बन को कैप्चर करने का सबसे अच्छा तरीका

पृ्थ्वी का दो तिहाई हिस्सा समुद्र से ढका है. अमेरिका के राष्ट्रीय महासागरीय और जलवायु प्रशासन के मुताबिक, महासागरों के सतह पर मौजूद पानी के 60 फीसदी हिस्से ने 2022 में कम-से-कम एक बार गरम हवाओं का सामना किया. यह पूर्व औद्योगिक स्तर की तुलना में करीब 50 फीसदी ज्यादा है.

अपील करने वाले नौ द्वीपीय देशों में वनुआतु, तुवालु के अलावा बहामस, नीयू, पलाउ, सेंट किट्स एंड नेविस, सेंट लुसिया, सेंट विंसेंट और ग्रेनाडिनेस भी शामिल हैं.

एनआर/एसएम (एएफपी)