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जलवायु पर गलत जानकारी फैलाने से किसे फायदा मिलेगा?

मार्टिन कुएब्लर
२६ जनवरी २०२४

जलवायु विज्ञान के विरोधियों और जीवाश्म ईंधन के समर्थकों के पास जलवायु परिवर्तन को लेकर संदेह पैदा करने के कई तरीके हैं. और इन सबकी वजह से तत्काल कार्रवाई बाधित हो सकती है.

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Kaiserpinguine in der Antarktis
तस्वीर: Sebnem Coskun/AA/picture alliance

दुष्प्रचार यानी गलत सूचना तब होती है जब लोग जीवाश्म ईंधन उत्सर्जन या जलवायु परिवर्तन के बारे में गलत जानकारी साझा करते हैं या फिर कुछ चुनिंदा आंकड़े पेश करते हैं जो पूरी तस्वीर नहीं दिखाते. और ये सूचनाएं इस तरह से लोगों को प्रभावित कर सकती हैं कि अन्य लोग इस मुद्दे के बारे में कैसे सोचते हैं. इसके लिए जानबूझकर कुछ करने की जरूरत नहीं है बल्कि कोई भी एक साधारण गलती, या किसी जटिल विषय के संदर्भ में किसी गलतफहमी की वजह से ऐसे दुष्प्रचार आसानी से फैल सकते हैं.

इसका एक उदाहरण ग्रीनवॉशिंग है. यह एक ऐसा तरीका है जिससे व्यावसायिक लोग अपनी पर्यावरणीय साख को, वास्तव में जितना वे हैं उससे अधिक पर्यावरण के अनुकूल बनाते हैं. उदाहरण के लिए, कुछ फैशन कंपनियां नवीकरणीय, प्राकृतिक रेशों और पुनर्चक्रण योग्य पैकेजिंग के उपयोग को बढ़ावा देते हैं, जिससे उनका ध्यान तेज, डिस्पोजेबल फैशन के तमाम उन चीजों से हट जाता है जो कुछ ही हफ्तों में तैयार हो जाते हैं.

दूसरी तरफ, दुष्प्रचार तब होता है जब जलवायु विज्ञान के विरोधी और अन्य समूह या आधिकारिक संगठन पर्यावरण को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से जलवायु विज्ञान और सरकारी नीतियों के खिलाफ अपने खुद के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए जानबूझकर गलत जानकारी प्रचारित करते हैं या अफवाह फैलाते हैं.

गलत सूचनाओं का असर

शेल, एक्सॉन मोबिल, बीपी जैसी प्रमुख जीवाश्म ईंधन कंपनियों पर जलवायु विज्ञान को बदनाम करने या लॉबिंग के साथ अपने जीवाश्म ईंधन पर लगातार हो रहे निवेश को छिपाने का आरोप लगाया गया है. ये कंपनियां 1970 के दशक से ही अपने समर्थन में सुखद एहसास वाले विज्ञापन प्रकाशित करती रही हैं. ऐसे ही आरोप ग्लोबल क्लाइमेट कोएलिशन नामक संगठन पर भी लगे थे. यह जीवाश्म ईंधन उद्योग से जुड़ी कंपनियों का एक अग्रणी समूह है जिसे साल 2002 में भंग कर दिया गया था.

उदाहरण के लिए, अमेरिका में द एंपावरमेंट अलायंस या यूरोप में रिस्पॉन्सिबल एनर्जी सिटीजन कोएलिशन जैसे समूह जीवाश्म ईंधन से प्राप्त प्राकृतिक गैस का समर्थन करने और हरित नीतियों को बदनाम करने के लिए एस्ट्रोटर्फिंग नाम की एक रणनीति का उपयोग करते हैं. इसके तहत अपने समर्थन और हरित नीतियों के विरोध में कुछ आंदोलन प्रायोजित कराए जाते हैं जो कि जन आंदोलन जैसे प्रतीत होते हैं. इन आंदोलनों के लिए धन कहां से आता है, इसकी भी जानकारी स्पष्ट नहीं होती है.

गलत सूचना और झूठ कुछ मीडिया संस्थानों द्वारा भी प्रकाशित किए जाते हैं या फिर कुछ लोकप्रिय राजनेता भी इनके प्रचार में उतर जाते हैं. सितंबर 2023 में जब ब्राजील में चक्रवात के कारण बाढ़ आई थी और 40 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी तो सरकारी विरोधियों और एक प्रमुख पत्रकार ने इसके लिए बांध की विफलताओं को जिम्मेदार ठहराया था ताकि वैश्विक तापन के अत्यधिक प्रभावों को कम करने के प्रयासों से लोगों का ध्यान हटाया जा सके.

तस्वीरों और वीडियोज में हेर-फेर करके सोशल मीडिया ने ऐसी गलत सूचनाओं का प्रसार और भी आसान बना दिया है, खासकर जब इन सब के पीछे कोई साजिश हो रही हो. जैसे हाल ही में स्थाई शहरी नियोजन के खिलाफ सोशल मीडिया पर 15-minute cities​ को ट्रेंड कराया गया था.

क्लाइमेट एक्शन अगेंस्ट डिसइनफॉर्मेशन, एक वैश्विक गठबंधन है जो कि जलवायु संबंधी गलत सूचनाओं और दुष्प्रचार के खिलाफ काम करता है. इस संगठन के मुताबिक, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर (अब X) को जब से इलॉन मस्क ने खरीदा है, तब से उस पर #ClimateScam जैसे हैशटैग के साथ जलवायु विज्ञान विरोधी ट्वीट्स काफी बढ़ गए हैं.

गलत सूचना ने हाल के वर्षों में नीति निर्धारण में भी घुसपैठ की है, खासकर डॉनल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति पद पर रहने के दौरान. उन्होंने अपने कार्यकाल से पहले और कार्यकाल के दौरान बार-बार नवीकरणीय ऊर्जा की आलोचना की और जलवायु विज्ञान को खारिज कर दिया. यही नहीं, वे अक्सर ग्लोबल वॉर्मिंग को एक धोखा कहते रहे हैं. ट्रंप अमेरिका को 2015 के पेरिस समझौते से बाहर निकालना चाहते हैं, जिससे अमेरिकी और शायद वैश्विक जलवायु कार्रवाई में कई साल की देरी हो सकती है.

जलवायु के बारे में दुष्प्रचार से क्या होता है?

ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और वैश्विक तापमान जैसे-जैसे एक के बाद एक रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच रहे हैं, वैश्विक गर्मी से निपटने के लिए समय उसी रफ्तार से कम होता जा रहा है. ज्यादातर वैज्ञानिक इस बात से सहमत हैं कि हमें अब कार्रवाई करने की आवश्यकता है, लेकिन जलवायु संबंधी गलत सूचना देने वाले यानी दुष्प्रचार करने वाले लोग इसी दौरान जलवायु विज्ञान पर ही सवाल उठा रहे हैं. और लोगों को भी प्रेरित कर रहे हैं कि वो सवाल उठाएं कि मानवता ने जलवायु परिवर्तन को बढ़ाया है और समाधानों पर संदेह जताया है, जिससे जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में जनता का समर्थन कम हो रहा है.

कश्मीर में केसर की खेती बचाने की कोशिशें

साल 2022 में जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल ने पहली बार माना कि ‘जलवायु परिवर्तन पर घृणास्पद गलत सूचनाओं और विज्ञान को जानबूझकर कमजोर करने की कोशिशों ने वैज्ञानिक सहमति, अनिश्चितता, उपेक्षित जोखिम और तात्कालिकता और असहमति की गलत धारणाओं में योगदान दिया है.'

क्लाइमेट एक्शन अगेंस्ट डिसइनफॉर्मेशन जैसे जलवायु समर्थनक समूह, यूरोपीय संघ सहित तमाम देशों की सरकारें, संयुक्त राष्ट्र, विश्व मौसम विज्ञान संगठन और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे विश्वव्यापी संगठन, गलत सूचनाओं को रोकने और उसका मुकाबला करने के लिए काम कर रहे हैं.

कई मीडिया संगठनों ने भी जलवायु रिपोर्टिंग और पर्यावरण संबंधी मिथकों और धोखे को दूर करने के लिए काम कर रहे हैं और इसके लिए अपने संसाधन समर्पित किए हैं.