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मानवाधिकारअफगानिस्तान

मुश्किल हालात में दिन गुजार रहे अफगान शरणार्थी

२० नवम्बर २०२३

पाकिस्तान से निकाले गए शरणार्थियों को अफगानिस्तान में घर खोजने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है और बेरोजगारी का डर सता रहा है.

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पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच की सीमा पर तोरखम में कैंपों में रह रहे शरणार्थी
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच की सीमा पर तोरखम में कैंपों में रह रहे शरणार्थीतस्वीर: Ebrahim Noroozi/AP Photo/picture alliance

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच की सीमा पर तोरखम अफगान शरणार्थियों के लिए एक अस्थायी निवास बन गया है. चट्टानी पहाड़ों की तलहटी में कई नीले तंबू हैं, जिनमें अफगान शरणार्थियों को गर्म दिन और जमा देने वाली ठंडी रातें बितानी पड़ रही हैं.

सीमा पर अधिकारियों का कहना है कि पाकिस्तानी सरकार द्वारा शरणार्थियों को देश छोड़ने का आदेश दिए जाने के बाद से कम से कम दो लाख से अधिक शरणार्थी तोरखम सीमा पार कर अफगानिस्तान चले गए हैं. उनमें से कई ने अपना पूरा जीवन या फिर कई ने तो दशकों अफगानिस्तान से दूर बिताए हैं.

इन शरणार्थियों को अफगानिस्तान रवाना होने से पहले सहायता के रूप में 15,000 अफगानी मुद्रा दी जा रही है. लेकिन यह राशि एक परिवार को एक महीने से अधिक समय तक गुजारा करने के लिए अपर्याप्त है.

इनमें से अधिकतर शरणार्थियों के लिए अफगानिस्तान में कुछ भी नहीं बचा है. तोरखम सीमा पर एक अस्थायी शिविर में रहने वाले ऐसे ही एक अफगान प्रवासी शेर आगा हैं, जो पाकिस्तान में सुरक्षा गार्ड के रूप में काम कर रहे थे.

कई शरणार्थियों का अफगानिस्तान से अब कोई रिश्ता नहीं
कई शरणार्थियों का अफगानिस्तान से अब कोई रिश्ता नहींतस्वीर: Ebrahim Noroozi/AP Photo/picture alliance

अफगानिस्तान से अब कोई रिश्ता नहीं

शेर आगा अपने नौ बच्चों के साथ अफगानिस्तान के कुंदुज प्रांत जाने की योजना बना रहे हैं. लेकिन वे कहते हैं, "वहां हमारा कोई ठिकाना नहीं है. हमारे पास वहां कोई घर नहीं है, कोई जमीन नहीं है और कोई काम नहीं है." 

शेर आगा ने पांच साल की उम्र में अफगानिस्तान छोड़ दिया था. अब जब वह 43 साल के हो गए हैं तो उनका कहना है कि उनके मन में अफगानिस्तान की कोई याद नहीं है.

उन्होंने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया, "वहां मेरा कोई रिश्तेदार नहीं है और मेरे बच्चे मुझसे पूछते हैं कि हम किस देश में जा रहे हैं."

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40 साल की अमीना भी अपने 10 बच्चों और पति के साथ तोरखम की सीमा पर दूसरे टेंट में रह रही हैं. वहां से वह जलालाबाद की यात्रा करने की योजना बना रही हैं. वह बताती हैं कि वहां उनके "कई भाई हैं."

अमीना ने एएफपी को बताया कि उन्होंने जलालाबाद में अपने रिश्तेदारों से किराए के लिए घर ढूंढने का अनुरोध किया था, लेकिन उन्हें बताया गया कि किराए के लिए कोई घर उपलब्ध नहीं है.

पाकिस्तान में अमीना के बेटे घर चलाने के लिए सब्जियां बेचते थे और रिक्शा चलाते थे. उन्हें डर है कि उनके बेटों को अफगानिस्तान में आजीविका के अधिक अवसर नहीं मिलेंगे जहां लोग आर्थिक संकट के कारण बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं. उनका कहना है कि अगर उनके बेटों को काम नहीं मिला तो उनके लिए अफगानिस्तान में रहना मुश्किल हो जाएगा.

कैंप में जिंदगी

पाकिस्तान छोड़कर आए एक और अफगान शरणार्थी अमानुल्लाह अपने परिवार के साथ अफगानिस्तान के लघमान प्रांत पहुंच गए हैं. लेकिन वहां भी उन्हें एक अस्थायी शिविर में रहना पड़ रहा है और फिलहाल अफगानिस्तान में उनके पास कोई अन्य आश्रय नहीं है.

अमानुल्लाह इस समय 43 साल के हैं, जिसमें से 35 साल उन्होंने पाकिस्तान में बिताए हैं. उनका कहना है कि उनकी पत्नी और छह बच्चों के लिए कैंप में रहना मुश्किल हो रहा है.

उन्होंने एएफपी को बताया कि वहां कोई शौचालय नहीं है और महिलाओं को विशेष रूप से समस्याओं का सामना करना पड़ता है. अमानुल्लाह के मुताबिक कैंप की महिलाओं को शौच के लिए समूह में जाना पड़ता है और रात होने का इंतजार करना पड़ता है.

इस कैंप में बिजली सप्लाई की भी समस्या है. अमानुल्लाह कहते हैं, "अगर हमें यहां पांच दिन, एक महीना या एक साल ज्यादा रहना है, तो यह सही है लेकिन हमें काम और एक घर की जरूरत है. हम यहां शून्य से जीवन शुरू कर रहे हैं."

पाकिस्तान सरकार अपने यहां दशकों से रह रहे लाखों अफगान प्रवासियों को वापस उनके देश भेजने के लिए व्यापक अभियान चला रही है. उसका कहना है कि इस अभियान के तहत उन लोगों को निकाला जा रहा है जो पाकिस्तान में अवैध रूप से रह रहे थे.

इस महीने में अब तक कुल दो लाख लोगों को अफगानिस्तान भेजा जा चुका है. पाकिस्तानी अधिकारियों का कहना है कि उनके देश में लगभग 40 लाख अफगान रह रहे हैं और इनमें से 17 लाख शरणार्थी ऐसे हैं जिनके पास कोई वैध दस्तावेज नहीं हैं.

एए/सीके (एएफपी)